सच बोलने से कोई गुरेज़ नहीं होना चाहिए। पर हां सिर्फ सच बोलने से ही काम नहीं चलने वाला, आचरण में सच्चाई हो, संबंधों में वफादारी हो तब तो सच्चाई के नज़दीक माना जाएगा अन्यथा कथनी और करनी में बड़ा भेद दृष्टिगत होने लगता है।
छोटे से जीवन से प्राप्त थोड़े अनुभवों के आधार पर मैं आज इसी निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ कि 'व्यक्ति' और 'अच्छा समय' देखकर ख़ुद को बदलना उचित नहीं, ऐसा करने से हो सकता है तनिक क्षण के लिये सुकून और समृद्धि मिले पर हम ख़ुद को ख़ुद से एवं समाज के नज़रों से ओझल करते चले जाते हैं! हम संबंधों में हों या फिर निजी जीवन में ईमानदारी, त्याग, समपर्ण और विश्वास बनें रहना चाहिए।
चकाचौंध की दुनिया में संबंध भी बाजारवाद से ग्रस्त है, हम संबंध को स्वार्थ के नजरिए से वरीयता क्रम में सज़ा कर तवज्जो दे रहें हैं। यह गलत है...पहले रिश्ते या तो खून के हुआ करते थे या फिर भावनाओं के। पर जबसे पूंजी ताकतवर हुआ नए नए संबंध ईजाद होने लगे...प्रोफेशनल संबंध अलग, व्यापारिक संबंध अलग, आर्थिक संबंध अलग,...आदिक।
अब ऐसे में खून के रिश्ते और भावनाओं को ध्यान में रखकर बनाये गये संबंध फ़ीके पड़ते जा रहें हैं।
थोड़ा सा गौर करने पर लगता है कि आज़ादी के बाद के सरकार, समाज और धर्म के कु़छ नाकामियों ने हिंदुस्तानियों के मनोबल को उठाने के बजाय और ज्यादा ही कुंठित किया इसीलिए आम जन मानस में आत्मविश्वास और प्रबल होने के बावजूद क्षीण ही होता चला गया परिणाम ये निकला कि कमोबेश अधिकांश हिंदुस्तानियों का पुरुषार्थ कम होता गया और हम मानसिक रूप से पंगु होते चले गये जिसने छोटे छोटे लाभ के आधार पर अच्छा बुरा के बीच के फासलों को तय करने का एक नया नजरिया विकसित करने का नया तरीका ईजाद कराया, इसीलिए हम राजनीति में उसे बढ़िया मानने लगे जो दारू, कपड़ा साड़ी, हैण्डपम्प, थोड़ा ठीका पट्टा देने लगा, धनवान उसे मानने लगे जो पाकिट खर्च चला सके, विद्वान उसे मानने लगे जो नौकरी लगवा सके, और इन्हीं सब तत्वों के आधार पर हमने संबंधों को वरीयता देना शुरू किया। निजी हित के आधार पर चरित्र प्रमाणपत्र बांटे जाये जाने लगेऔर आज यह एक बड़ी वजह है जो आत्मनिर्भरता से कोसों दूर रखे हुए है, इसीलिए हम सामन्य बोल चाल की भाषा में बोलना शुरू कर दिए हैं कि क्या अच्छे हैं जब कु़छ लाभ ही नहीं दिलाते???
निष्कर्ष यही है कि जब पूंजी ताकतवर होता है इंसान कमजोर और गौण होने लगता है। इसीलिए अब बहुत हद तक संबंध के केंद्र में पूंजी है। और जहां पूंजी मजबूत होगा वहाँ सच की कोई प्रासंगिकता नहीं होगी पर हां सच सार्वत्रिक है इसीलिए सच बोलने से कोई गुरेज़ नहीं होना चाहिए चाहे जीतनी भी प्रतिकूल परिस्थिति क्यूँ न हो।
सुरेश राय चुन्नी।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय
छोटे से जीवन से प्राप्त थोड़े अनुभवों के आधार पर मैं आज इसी निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ कि 'व्यक्ति' और 'अच्छा समय' देखकर ख़ुद को बदलना उचित नहीं, ऐसा करने से हो सकता है तनिक क्षण के लिये सुकून और समृद्धि मिले पर हम ख़ुद को ख़ुद से एवं समाज के नज़रों से ओझल करते चले जाते हैं! हम संबंधों में हों या फिर निजी जीवन में ईमानदारी, त्याग, समपर्ण और विश्वास बनें रहना चाहिए।
चकाचौंध की दुनिया में संबंध भी बाजारवाद से ग्रस्त है, हम संबंध को स्वार्थ के नजरिए से वरीयता क्रम में सज़ा कर तवज्जो दे रहें हैं। यह गलत है...पहले रिश्ते या तो खून के हुआ करते थे या फिर भावनाओं के। पर जबसे पूंजी ताकतवर हुआ नए नए संबंध ईजाद होने लगे...प्रोफेशनल संबंध अलग, व्यापारिक संबंध अलग, आर्थिक संबंध अलग,...आदिक।
अब ऐसे में खून के रिश्ते और भावनाओं को ध्यान में रखकर बनाये गये संबंध फ़ीके पड़ते जा रहें हैं।
थोड़ा सा गौर करने पर लगता है कि आज़ादी के बाद के सरकार, समाज और धर्म के कु़छ नाकामियों ने हिंदुस्तानियों के मनोबल को उठाने के बजाय और ज्यादा ही कुंठित किया इसीलिए आम जन मानस में आत्मविश्वास और प्रबल होने के बावजूद क्षीण ही होता चला गया परिणाम ये निकला कि कमोबेश अधिकांश हिंदुस्तानियों का पुरुषार्थ कम होता गया और हम मानसिक रूप से पंगु होते चले गये जिसने छोटे छोटे लाभ के आधार पर अच्छा बुरा के बीच के फासलों को तय करने का एक नया नजरिया विकसित करने का नया तरीका ईजाद कराया, इसीलिए हम राजनीति में उसे बढ़िया मानने लगे जो दारू, कपड़ा साड़ी, हैण्डपम्प, थोड़ा ठीका पट्टा देने लगा, धनवान उसे मानने लगे जो पाकिट खर्च चला सके, विद्वान उसे मानने लगे जो नौकरी लगवा सके, और इन्हीं सब तत्वों के आधार पर हमने संबंधों को वरीयता देना शुरू किया। निजी हित के आधार पर चरित्र प्रमाणपत्र बांटे जाये जाने लगेऔर आज यह एक बड़ी वजह है जो आत्मनिर्भरता से कोसों दूर रखे हुए है, इसीलिए हम सामन्य बोल चाल की भाषा में बोलना शुरू कर दिए हैं कि क्या अच्छे हैं जब कु़छ लाभ ही नहीं दिलाते???
निष्कर्ष यही है कि जब पूंजी ताकतवर होता है इंसान कमजोर और गौण होने लगता है। इसीलिए अब बहुत हद तक संबंध के केंद्र में पूंजी है। और जहां पूंजी मजबूत होगा वहाँ सच की कोई प्रासंगिकता नहीं होगी पर हां सच सार्वत्रिक है इसीलिए सच बोलने से कोई गुरेज़ नहीं होना चाहिए चाहे जीतनी भी प्रतिकूल परिस्थिति क्यूँ न हो।
सुरेश राय चुन्नी।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय
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